कक्षा (Orbit)

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कक्षा (Orbit) भौतिक विज्ञान और खगोल विज्ञान में किसी खगोलीय पिंड (जैसे ग्रह, उपग्रह, क्षुद्रग्रह अथवा अंतरिक्ष यान) का वह वक्र गुरुत्वाकर्षण पथ है, जिस पर वह किसी अन्य केंद्रीय पिंड के चारों ओर निरंतर परिक्रमा करता है।[1] उदाहरणस्वरूप, किसी तारे के चारों ओर ग्रह की गति अथवा किसी ग्रह के चारों ओर उपग्रह की गति एक निश्चित कक्षा में होती है।

अधिकांश प्राकृतिक और कृत्रिम खगोलीय कक्षाएँ दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) होती हैं, जिनके एक नाभि-केंद्र (Focus) पर दोनों पिंडों का संयुक्त गुरुत्व केंद्र अथवा बैरीसेंटर (Barycenter) स्थित होता है।[2]

इतिहास एवं सैद्धांतिक विकास

  • प्रारंभिक भू-केंद्रित मॉडल: प्राचीन और मध्यकालीन काल में यूरोप और अरब में ब्रह्मांड का भू-केंद्रित (Geocentric) मॉडल प्रचलित था, जिसमें खगोलीय पिंडों को संकेंद्री पारदर्शी गोलों पर गतिमान माना जाता था।
  • केप्लर के नियम (17वीं शताब्दी): जोहान्स केप्लर ने टाइको ब्राहे के सटीक प्रेक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि ग्रहों की कक्षाएँ पूर्ण वृत्ताकार न होकर दीर्घवृत्ताकार होती हैं तथा सूर्य इस दीर्घवृत्त के एक फोकस पर स्थित होता है।[3]
  • न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत: सर आइजैक न्यूटन ने अपने व्युत्क्रम वर्ग नियम (Inverse Square Law) द्वारा सिद्ध किया कि केप्लर के नियम गुरुत्वाकर्षण बल के प्रत्यक्ष परिणाम हैं और कक्षाएँ अनिवार्यतः शंकु परिच्छेद (Conic sections: वृत्त, दीर्घवृत्त, परवलय, या अतिपरवलय) का पालन करती हैं।[4]
  • आइंस्टीन का सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत: अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1915 में प्रतिपादित किया कि गुरुत्वाकर्षण कोई पारम्परिक बल नहीं बल्कि दिक्-काल (Spacetime) की वक्रता है, और खगोलीय पिंड इस वक्र दिक्-काल में भूगणितीय (Geodesic) पथों का अनुसरण करते हैं। इसने बुध ग्रह की कक्षा में होने वाले अतिरिक्त पुरस्सरण (Perihelion Precession of Mercury) की पूर्ण व्याख्या की।

कक्षा को समझने का न्यूटन का विचार प्रयोग

कक्षा की भौतिकी को समझने के लिए न्यूटन ने एक पर्वत शिखर से तोप के गोले दागे जाने का प्रसिद्ध विचार प्रयोग (Thought Experiment) प्रस्तुत किया था:[5]

  1. कम क्षैतिज वेग: गोला गुरुत्वाकर्षण के कारण झुककर कुछ दूरी पर पृथ्वी की सतह से टकरा जाता है (उप-कक्षीय प्रक्षेप पथ)।
  2. कक्षीय वेग: यदि गोले को लगभग 7.9 km/s के सटीक क्षैतिज वेग से दागा जाए, तो जितनी दर से गोला नीचे गिरता है, ठीक उतनी ही दर से पृथ्वी की वक्राकार सतह भी उसके नीचे से झुकती जाती है। परिणामस्वरूप गोला कभी जमीन से नहीं टकराता और पृथ्वी के चारों ओर एक स्थिर वृत्तीय कक्षा में निरंतर घूमता रहता है।
  3. अतिरिक्त वेग: इस सीमा से अधिक वेग पर गोला दीर्घवृत्ताकार कक्षा का अनुसरण करता है।
  4. पलायन वेग: यदि वेग 2 गुना (लगभग 11.2 km/s) या उससे अधिक हो जाए, तो गोला परवलयाकार अथवा अतिपरवलयाकार पथ अपनाकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से हमेशा के लिए बाहर निकल जाता है।

केप्लर के तीन कक्षीय नियम

  1. दीर्घवृत्त का नियम: प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा करता है, जिसके एक फोकस पर सूर्य स्थित होता है।
  2. क्षेत्रफलीय चाल का नियम: सूर्य और ग्रह को मिलाने वाली रेखा समान समयांतरालों में समान क्षेत्रफल पार करती है (अर्थात् उपसौर/पेरिहेलियन पर ग्रह की चाल सर्वाधिक और अपसौर/एफेलियन पर न्यूनतम होती है)।
  3. आवर्तकाल का नियम: ग्रह के कक्षीय परिक्रमण काल का वर्ग (T2) उसकी कक्षा के अर्ध-दीर्घ अक्ष के घन (a3) के समानुपाती होता है:
T2∝a3

कक्षीय प्राचल (Keplerian Orbital Elements)

किसी आकाशीय पिंड की त्रिविमीय कक्षा को पूर्णतः निर्धारित करने के लिए छह मूलभूत मानकों की आवश्यकता होती है:

  • अर्ध-दीर्घ अक्ष (Semi-major Axis, a): कक्षा के आकार एवं विस्तार का माप।
  • उत्केन्द्रता (Eccentricity, e): कक्षा के दीर्घवृत्ताकार खिंचाव का माप (e=0 वृत्ताकार, 0<e<1 दीर्घवृत्ताकार, e=1 परवलयाकार)।
  • झुकाव (Inclination, i): संदर्भ तल (जैसे भूमध्यरेखीय तल) के सापेक्ष कक्षा का कोणीय झुकाव।
  • आरोही पात का रेखांश (Longitude of Ascending Node, Ω): संदर्भ दिशा के सापेक्ष कक्षा का दिक्-विन्यास।
  • पेरिऐप्सिस का कोणांक (Argument of Periapsis, ω): कक्षा के निकटतम बिंदु की दिशा।
  • माध्य विसंगति (Mean Anomaly at Epoch, M0): किसी संदर्भ समय पर कक्षा में पिंड की स्थिति।

पृथ्वी की प्रमुख उपग्रह कक्षाएँ

  • निम्न भू-कक्षा (LEO - Low Earth Orbit): पृथ्वी की सतह से 160 km से 2,000 km तक की ऊँचाई। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (~400 किमी) तथा अधिकांश रिमोट सेंसिंग उपग्रह इसी कक्षा में कार्यरत हैं।[6]
  • मध्यम भू-कक्षा (MEO - Medium Earth Orbit): 2,000 km से 35,786 km तक की ऊँचाई। जीपीएस (GPS), ग्लोनास और गैलीलियो जैसे नेविगेशन उपग्रह समूह प्रायः 20,200 किमी की ऊँचाई पर 12 घंटे के आवर्तकाल वाली कक्षाओं में स्थित हैं।
  • भू-तुल्यकालिक एवं भू-स्थिर कक्षा (GEO / GSO): विषुववृत्त से ठीक 35,786 km ऊपर (a≈42,164 km)। इसका परिक्रमण काल पृथ्वी के घूर्णन काल (23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड) के बराबर होता है, जिससे उपग्रह पृथ्वी से देखने पर एक ही स्थान पर स्थिर प्रतीत होता है (संचार एवं मौसम उपग्रहों हेतु प्रयुक्त)।[7]
  • उच्च भू-कक्षा (HEO - High Earth Orbit): भू-स्थिर कक्षा की ऊँचाई (>35,786 km) से परे स्थित कक्षाएँ।[8]

ज्वारीय बंधन (Tidal Locking)

जब किसी उपग्रह का अपनी धुरी पर घूर्णन काल उसके केंद्रीय ग्रह के चारों ओर कक्षीय परिक्रमण काल के ठीक बराबर हो जाता है, तो इस अवस्था को 'ज्वारीय बंधन' कहते हैं। चंद्रमा पृथ्वी के साथ ज्वारीय रूप से बंधा हुआ है, जिसके कारण पृथ्वी से सदैव चंद्रमा का केवल एक ही पार्श्व दिखाई देता है।

संदर्भ

  1. ↑ Encyclopædia Britannica. "Orbit (astronomy)". Britannica Online Encyclopedia.
  2. ↑ NASA Space Place. "What's a Barycenter?". NASA.
  3. ↑ Jones, Andrew. "Kepler's Laws of Planetary Motion". About.com Physics.
  4. ↑ Kuhn, Thomas S. (1957). The Copernican Revolution, Harvard University Press, pp. 238–252. ISBN 978-0-674-17103-9.
  5. ↑ Newton, Isaac (1728). A Treatise of the System of the World, F. Fayram, pp. 6–8.
  6. ↑ NASA Office of Safety and Mission Assurance (1995). Guidelines and Assessment Procedures for Limiting Orbital Debris, NASA NSS 1740.14, pp. 37–38.
  7. ↑ Vallado, David A. (2007). Fundamentals of Astrodynamics and Applications. Microcosm Press, p. 31. ISBN 978-0-387-71831-6.
  8. ↑ NASA Global Change Master Directory (2013). "Orbit: Definition".