सामान्य हॉक-कुकू (Common hawk-cuckoo)
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सामान्य हॉक-कुकू (Common Hawk-Cuckoo, वैज्ञानिक नाम: Hierococcyx varius), जिसे आमतौर पर ब्रेन-फीवर पक्षी (Brain-fever bird) भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला मध्यम आकार का कोयल (cuckoo) प्रजाति का पक्षी है। यह दिखने, उड़ने के तरीके और डाल पर बैठने के अंदाज़ में काफी हद तक शिकरा (Shikra) बाज़ से मिलता-जुलता है। बाज़ (hawk) जैसी इसी समानता के कारण इसके नाम में "हॉक-कुकू" जुड़ा है। अन्य कई कोयलों की तरह, ये भी ब्रूड पैरासाइट (brood parasites) यानी परजीवी होते हैं; जिसका अर्थ है कि ये अपने अंडे बैबलर (babbler) पक्षियों के घोंसलों में देते हैं।
गर्मियों में प्रजनन काल के दौरान, नर पक्षी तेज़ और बार-बार दोहराई जाने वाली तीन स्वरों की पुकार लगाते हैं। इस आवाज़ को अंग्रेज़ी के "ब्रेन-फीवर" (brain-fever) शब्द से आसानी से समझा जा सकता है। इसमें दूसरा स्वर लंबा और अधिक ऊंचे स्वर (pitch) वाला होता है। यह आवाज़ धीरे-धीरे तेज़ होती है और फिर अचानक रुक जाती है। कुछ मिनटों के बाद यह फिर से शुरू हो जाती है। यह आवाज़ दिन भर, सूर्यास्त के बाद और यहां तक कि सुबह होने से पहले भी सुनी जा सकती है।
विवरण (Description)
सामान्य हॉक-कुकू एक मध्यम से बड़े आकार की कोयल है। इसकी लंबाई लगभग 34 सेमी होती है और आकार में यह कबूतर जैसी लगती है। शरीर का ऊपरी हिस्सा राख जैसा सलेटी (ashy grey) होता है, जबकि निचला हिस्सा सफेद होता है जिस पर भूरे रंग की आड़ी धारियां (cross-bars) होती हैं। पूंछ पर चौड़ी आड़ी धारियां होती हैं। नर और मादा पक्षी एक जैसे दिखते हैं। इनकी एक विशेष पहचान आंखों के चारों ओर मौजूद चमकीला पीला घेरा है।
उप-वयस्क (sub-adult) पक्षियों की छाती पर धारियां होती हैं, और वे युवा शिकरा जैसे दिखते हैं। पेट पर बड़े भूरे रंग के शेवरॉन (chevron) आकार के धब्बे होते हैं। पहली नज़र में इन्हें बाज़ समझने की भूल हो सकती है। उड़ते समय ये अपने पंख फड़फड़ाते हैं और फिर कुछ देर हवा में तैरते (flap-and-glide) हैं। यह तरीका स्पैरोहॉक (Sparrowhawk) और विशेष रूप से शिकरा के उड़ने के तरीके से मिलता-जुलता है। ऊपर उड़कर जब ये किसी डाल पर बैठते हैं तो अपनी पूंछ को एक तरफ से दूसरी तरफ हिलाते हैं। छोटे पक्षी और गिलहरियां इन्हें देखकर असली बाज़ के आने की चेतावनी वाली आवाज़ें निकालते हैं। यद्यपि नर और मादा एक जैसे दिखते हैं, लेकिन नर आमतौर पर थोड़े बड़े होते हैं।[1]
इन्हें 'लार्ज हॉक-कुकू' (Large Hawk-Cuckoo) समझने का भ्रम भी हो सकता है। हालांकि, लार्ज हॉक-कुकू के गले और छाती पर गहरी धारियां होती हैं। युवा सामान्य हॉक-कुकू की ठुड्डी (chin) हल्के रंग की होती है, जबकि युवा लार्ज हॉक-कुकू की ठुड्डी काली होती है।[2]

मानसून शुरू होने से पहले गर्मियों के महीनों में नर पक्षियों को उनकी बार-बार दोहराई जाने वाली आवाज़ से आसानी से पहचाना जा सकता है, लेकिन उन्हें पेड़ों में देखना मुश्किल होता है। इनकी पुकार तीन स्वरों की होती है जो तेज सुनाई देती है। यह पांच या छह बार लगातार दोहराई जाती है, धीरे-धीरे तेज होती है और अचानक रुक जाती है। यह आवाज़ दिन भर और अक्सर चांदनी रातों में भी सुनी जा सकती है।[3] मादा पक्षियों की आवाज़ तीखी (गरगराहट जैसी) होती है।[1]
सामान्य हॉक-कुकू मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े खाते हैं। विशेष रूप से ये बालों वाली इल्लियों (caterpillars) को खाने में माहिर होते हैं। इल्लियों की आंतों में अक्सर जहरीले तत्व होते हैं। कई अन्य कोयलों की तरह, ये इल्ली को डाल पर रगड़कर उसकी आंतों को निकाल देते हैं और फिर उसे निगल लेते हैं। यदि वे बालों को भी निगल लेते हैं, तो वे पेट में अलग हो जाते हैं और बाद में एक छर्रे (pellet) के रूप में बाहर उगल दिए जाते हैं।[2]
वर्गीकरण (Taxonomy)
इस प्रजाति का टाइप लोकैलिटी (type locality) तमिलनाडु का तरंगमबाड़ी (Tranquebar) है, जो कभी एक डेनिश उपनिवेश था। वहां से एक नमूना मार्टिन हेन्ड्रिक्सन वाह्ल (Martin Hendriksen Vahl) तक पहुंचा, जिन्होंने 1797 में इस प्रजाति का वैज्ञानिक वर्णन किया।[4]
इस प्रजाति को अन्य हॉक-कुकू के साथ Hierococcyx वंश में रखा जाता है, हालांकि कुछ वर्गीकरण प्रणालियों में इसे Cuculus वंश में भी शामिल किया जाता है।[5]
इस प्रजाति की दो उपप्रजातियां (subspecies) पहचानी गई हैं: भारत में पाई जाने वाली मुख्य उपप्रजाति (nominate subspecies) H. v. varius, और श्रीलंका के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाने वाली H. v. ciceliae।[6] भारतीय आबादी के पक्षियों के पंख ciceliae की तुलना में हल्के रंग के होते हैं।[5]
वितरण और आवास (Distribution and Habitat)
सामान्य हॉक-कुकू भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में पाया जाता है। पश्चिम में पाकिस्तान से शुरू होकर, हिमालय की तलहटी से होते हुए पूर्व में नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत तक इसका विस्तार है।[7] दक्षिण की ओर यह श्रीलंका तक फैला हुआ है।
भारत के कुछ पक्षी सर्दियों में श्रीलंका प्रवास (migrate) करते हैं। श्रीलंका के मध्य भाग के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाने वाली ciceliae उपप्रजाति वहीं की स्थायी निवासी है। हालांकि यह प्रजाति आमतौर पर स्थायी निवासी है, लेकिन ऊंचे और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में यह स्थानीय प्रवास करती है। हिमालय में यह आमतौर पर 1000 मीटर से कम ऊंचाई पर पाई जाती है; इससे अधिक ऊंचाई पर लार्ज हॉक-कुकू अधिक पाए जाते हैं।[1]
यह प्रजाति मुख्य रूप से पेड़ों पर रहने वाली (arboreal) है; यह बहुत कम ही जमीन पर उतरती है। इसके प्राकृतिक आवासों में बाग-बगीचे, पेड़ों के झुरमुट, पर्णपाती वन (deciduous forests) और अर्ध-सदाबहार वन (semi-evergreen forests) शामिल हैं।[1]
व्यवहार और पारिस्थितिकी (Behavior and Ecology)

कई अन्य कोयलों की तरह, यह प्रजाति भी एक ब्रूड पैरासाइट (brood parasite) है। यह मुख्य रूप से Turdoides वंश के बैबलर पक्षियों के घोंसलों में अपने अंडे देती है। माना जाता है कि यही इसके एकमात्र मेज़बान (host) प्रजाति हैं।[5] इसके अतिरिक्त, Garrulax वंश के लाफिंगथ्रश (laughing-thrush) पक्षियों के घोंसलों में भी परजीविता की खबरें मिली हैं।[8]
इसका प्रजनन काल मार्च से जून तक होता है, जो कुछ Turdoides बैबलर पक्षियों के प्रजनन काल के साथ मेल खाता है। यह हर घोंसले में एक ही अंडा देती है। अंडा मेज़बान पक्षी के अंडों की तरह ही नीले रंग का होता है। अंडे से निकला बच्चा आमतौर पर मेज़बान पक्षी के अंडों को घोंसले से बाहर धकेल देता है। इसके बाद पालक माता-पिता उसे पालते हैं, और लगभग एक महीने तक वह उनके पीछे-पीछे घूमते हुए परिपक्व होता है।[2]
थॉमस सी. जर्डन (T. C. Jerdon) के अनुसार, ये बच्चे हर बार मेज़बान पक्षी के अंडों को बाहर नहीं धकेलते; कभी-कभी युवा हॉक-कुकू और युवा बैबलर एक ही घोंसले में एक साथ देखे जा सकते हैं।[9]
बैबलर के झुंड के साथ घूमते समय, हॉक-कुकू का बच्चा भोजन मांगने के लिए "की-की" जैसी कर्कश आवाज़ करता है। पालक माता-पिता या झुंड के अन्य बैबलर भी उसे खाना खिला सकते हैं।[1]
भारत में इस प्रजाति के मुख्य मेज़बान पक्षी जंगल बैबलर (Jungle babbler, Turdoides striata) और येलो-बिल्ड बैबलर (Yellow-billed babbler, Turdoides affinis) हैं।[10] हॉक-कुकू लार्ज ग्रे बैबलर (Large grey babbler, Turdoides malcolmi) के घोंसलों में भी परजीविता करते हैं।[3][11] श्रीलंका में इसका मुख्य मेज़बान Turdoides striata है।[12]
इन पक्षियों की आंखों की गुहा (orbital cavity) में Oxyspirura वंश के परजीवी आई-वर्म (eye-worms) पाए गए हैं।[13]
संस्कृति में (In Culture)
इस पक्षी की पुकार को अंग्रेजी भाषा में आमतौर पर ब्रेन-फीवर (brain-fever) के रूप में लिखा गया है। पुरानी किताबों में गलती से इस नाम का इस्तेमाल एशियाई कोयल (Asian koel) के लिए भी किया जाता था। फ्रैंक फिन (Frank Finn) ने इस पक्षी के बारे में टिप्पणी की थी: "इसकी आवाज़, चाहे लगातार दोहराव के कारण हो, या 'ब्रेन-फीवर' शब्द को धीरे-धीरे ऊंचे स्वर में बोलने जैसा लगने के कारण, यह नाम इसके लिए पूरी तरह उपयुक्त है।"[14]
चार्ल्स एम. इंगलिस (Charles M. Inglis) ने इसकी पुकार का वर्णन इस प्रकार किया था: "ओ लोर! ओ लोर! कितनी गर्मी हो रही है—हम महसूस कर रहे हैं, हम महसूस कर रहे हैं, हम महसूस कर रहे हैं (O lor’! O lor’! how very hot it’s getting—we feel it, we feel it, we feel it)"।[15]
भारत की विभिन्न भाषाओं में इस पक्षी की पुकार के अलग-अलग अर्थ निकाले गए हैं। हिंदी में इसे पीकहाँ (piyān kahān - "मेरा प्रिय कहाँ है?"), बंगाली में चोख गेलो (chokh gelo - "मेरी आँखें चली गईं"), और मराठी में पाऊस आला (paos ala - "बारिश आ गई") माना जाता है। बोडो भाषा में यह पुकार हाब फिशा हौवा (haab fisha houwa) जैसी लगती है, जिसका अर्थ है "प्रिय पुत्र, तुम कहाँ हो?"।
हालांकि, पीकहाँ या पपीहा (papiha) की पुकार वास्तव में लार्ज हॉक-कुकू (Hierococcyx sparverioides) की आवाज़ को अधिक सटीकता से दर्शाती है। हिमालयी क्षेत्रों की तलहटी में, यह प्रजाति सामान्य हॉक-कुकू का स्थान ले लेती है।[2]
ब्रेन-फीवर पक्षी की पुकार तड़के शुरू होकर दिन भर सुनाई देती है। पूर्णिमा जैसी चांदनी रातों में भी इसकी आवाज़ अक्सर सुनी जाती है।[3]
भारतीय लेखक एलन सीली (I. Allan Sealy) के एक उपन्यास का नाम इसी पक्षी के नाम पर द ब्रेनफीवर बर्ड (The Brainfever Bird) रखा गया है।[16]
संदर्भ (References)
- ↑ 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 Ali, S.; Ripley, S.D. (1981). "Handbook of the Birds of India and Pakistan. Volume 3" (2nd ed.). Oxford University Press, New Delhi. pp. 200–202.
- ↑ 2.0 2.1 2.2 2.3 Payne, R.B. (2005). "The Cuckoos". Oxford University Press. pp. 16, 469, 471–473.
- ↑ 3.0 3.1 3.2 Ali, Salim; Daniel, J.C. (2002). "The book of Indian Birds". Thirteenth Centenary edition. Bombay Natural History Society/Oxford University Press.
- ↑ Vahl, M.H. (1797). "Skrivter af Naturhistorie-Selskabet, Kjøbenhavn, 4, Heft 1". p. 60.
- ↑ 5.0 5.1 5.2 Rasmussen, PC; JC Anderton (2005). "Birds of South Asia: The Ripley Guide". Vol. 2. Smithsonian Institution & Lynx Edicions. p. 229.
- ↑ Phillips, W.W.A. (1949). "A new race of the Common Hawk Cuckoo from Ceylon". Bulletin of the British Ornithologists' Club. 69 (6): 56–57.
- ↑ BirdLife International (2022). Species factsheet: Hierococcyx varius. datazone.birdlife.org.
- ↑ Gaston, A.J.; Zacharias, V.J. (2000). "Hosts of the Common Hawk Cuckoo". Forktail. 16: 182.
- ↑ Jerdon, T.C. (1862). "The birds of India. Volume 1". Military Orphan Press. p. 330.
- ↑ Prasad, G.; Nameer, P.O.; Reshmi, M.V. (2001). "Brood parasitism by Indian Hawk-Cuckoo (Hierococcyx varius Vahl)". Zoos' Print Journal. 16 (8): 554–556.
- ↑ Blanford, W.T. (1895). "The Fauna of British India, Including Ceylon and Burma. Birds Volume 3". Taylor and Francis, London. pp. 213–214.
- ↑ Lushington, Cicely (1949). "Change in habits of the Ceylon Hawk-Cuckoo (Hierococcyx varius ciceliae Phillips)". Journal of the Bombay Natural History Society. 48 (3): 582–584.
- ↑ Sultana, Ameer (1964). "Some new eye-worms from birds in India". Parasitology Research. 23 (6): 532–547.
- ↑ Finn, Frank (1904). "The birds of Calcutta". Thacker, Spink & Co.
- ↑ Fletcher, T. B.; Inglis, C.M. (1924). "Some Common Indian Birds. No 26. The hawk-cuckoo (Hierococcyx varius)". The Agricultural Journal of India. 19: 111–116.
- ↑ Sealy, I. Allan (2003). "The Brainfever Bird". Picador. ISBN 0-330-41205-1.
और पढ़ें
- Whistler, H. (1918). "The Common Hawk-Cuckoo Hierococcyx varius in the Punjab". Journal of the Bombay Natural History Society. 26 (1): 287.
- Osmaston, A.E. (1912). "Eggs of the Large Hawk-Cuckoo Hierococcyx sparverioides". Journal of the Bombay Natural History Society. 21 (4): 1330–1331.
- Umar, M. (1977). "On the onset of brain-fever". Newsletter for Birdwatchers. 17 (2): 9.
- Himmatsinhji, M.K. (1980). "The Common Hawk-Cuckoo, Cuculus varius Vahl in Kutch". Journal of the Bombay Natural History Society. 77 (2): 329.
- Waite, H.W. (1963). "The Common Hawk-Cuckoo (Cuculus varius varius Vahl) in the Punjab". Journal of the Bombay Natural History Society. 60 (1): 260.
- Gay, Thomas (1976). "Onset of 'brain-fever'". Newsletter for Birdwatchers. 16 (3): 15.
- Mohan, D. (1976). "Onset of brainfever". Newsletter for Birdwatchers. 16 (5): 11.
- Ramamoorthi, M.S. (1976). "Onset of Brainfever". Newsletter for Birdwatchers. 16 (5): 9–11.
- Gay, T. (1988). "First calls of the Common Hawk Cuckoo". Newsletter for Birdwatchers. 28 (3–4): 16.
बाहरी कड़ियाँ
विकिमीडिया कॉमन्स पर सामान्य हॉक-कुकू से सम्बन्धित मीडिया उपलब्ध है।- इंटरनेट बर्ड कलेक्शन (Internet Bird Collection) पर प्रजातियों की जानकारी।
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