न्यूटन के गति नियम (Newton's Laws of Motion)
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न्यूटन के गति नियम (Newton's Laws of Motion) चिरसम्मत यांत्रिकी (Classical Mechanics) के तीन मूलभूत भौतिक नियम हैं, जो किसी वस्तु पर लगने वाले बाह्य बल और उसके परिणामस्वरूप होने वाली गति के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या करते हैं।[1]
ये तीनों नियम सर्वप्रथम 5 जुलाई 1687 को सर आइजैक न्यूटन की प्रसिद्ध कृति फिलोसोफिया नेचुरेलिस प्रिंसीपिया मैथेमेटिका (Principia Mathematica) में प्रकाशित हुए थे। इन नियमों का उपयोग आकाशीय पिंडों की गति से लेकर दैनिक जीवन की यांत्रिक प्रणालियों का विश्लेषण करने के लिए किया जाता है। दैनिक जीवन में प्रकाश की गति () से बहुत कम वेग वाले पिंडों के लिए ये नियम अत्यधिक सटीक परिणाम देते हैं।
अवलोकन
न्यूटन ने इन नियमों को बिंदु-द्रव्यमान (Point Masses) वाली वस्तुओं के लिए प्रतिपादित किया था। अपने ग्रंथ के तृतीय भाग में न्यूटन ने इन गति नियमों को अपने सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम के साथ जोड़कर केप्लर के ग्रहीय गति नियमों की सफल गणितीय व्याख्या प्रस्तुत की।
प्रथम नियम (जड़त्व का नियम)
कथन: प्रत्येक वस्तु अपनी विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एकसमान गति की अवस्था तब तक बनाए रखती है, जब तक कि उस पर कोई बाह्य असंतुलित बल कार्य न करे।
वस्तु द्वारा अपनी गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करने की इस अंतर्निहित प्रवृत्ति को जड़त्व (Inertia) कहते हैं।
गणितीय रूप में:
द्वितीय नियम (संवेग और बल का नियम)
कथन: किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस पर आरोपित बाह्य बल के समानुपाती होती है तथा संवेग परिवर्तन की दिशा आरोपित बल की दिशा में ही होती है।
यदि वस्तु का संवेग हो, तो:
नियत द्रव्यमान () की स्थिति में:
जहाँ:
- = परिणामी बल
- = वस्तु का द्रव्यमान
- = उत्पन्न त्वरण
आवेग (Impulse)
अत्यंत अल्प समय अंतराल में किसी वस्तु के संवेग में परिमित परिवर्तन करने वाले प्रबल बल और समयांतराल के गुणनफल को आवेग () कहते हैं:
परिवर्ती द्रव्यमान निकाय (Variable Mass Systems)
रॉकेट जैसे निकाय, जहाँ द्रव्यमान समय के साथ परिवर्तित होता है, में सीधा अवकलन लागू न होकर सापेक्ष वेग समीकरण का प्रयोग किया जाता है:
जहाँ निष्कासित द्रव्यमान का निकाय के सापेक्ष वेग है।
तृतीय नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम)
कथन: प्रत्येक क्रिया के बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। अर्थात् जब एक वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर बल लगाती है, तो दूसरी वस्तु भी पहली वस्तु पर परिमाण में उतना ही किंतु विपरीत दिशा में बल आरोपित करती है।
यदि दो वस्तुएँ A और B परस्पर अन्योन्यक्रिया कर रही हों, तो वस्तु A द्वारा B पर लगाया गया बल () और वस्तु B द्वारा A पर लगाया गया बल () परस्पर संतुलित होते हैं:
ऋणात्मक चिह्न बल की विपरीत दिशा को दर्शाता है। क्रिया और प्रतिक्रिया बल सदैव दो भिन्न वस्तुओं पर कार्य करते हैं, अतः वे कभी भी एक-दूसरे को निरस्त नहीं करते।
प्रमुख उदाहरण:
- रॉकेट का प्रक्षेपण: पीछे की ओर तीव्र गति से निकलने वाली गर्म गैसें (क्रिया) रॉकेट को आगे की ओर धकेलने वाला प्रणोद बल (प्रतिक्रिया) प्रदान करती हैं।
- तैरना: तैराक जल को पीछे की ओर धकेलता है (क्रिया), और जल तैराक को आगे की दिशा में गति प्रदान करता है (प्रतिक्रिया)।
- बंदूक का प्रतिक्षेप (Recoil): गोली आगे की ओर दागे जाने पर बंदूक पीछे की ओर झटका देती है।
संदर्भ
- ↑ Newton, Isaac (1687). Philosophiæ Naturalis Principia Mathematica, Jussu Societatis Regiæ ac Typis Josephi Streater.
