गोली (Bullet)

From LTRC

Template:Infobox weapon

गोली (Bullet / बुलेट) किसी आग्नेयास्त्र (जैसे बंदूक, राइफल या पिस्तौल) की नाल (बैरल) से दागे जाने वाला ठोस प्रक्षेप्य (Projectile) है। बोलचाल में अक्सर पूरे कारतूस (Cartridge) को गोली कह दिया जाता है, किंतु तकनीकी रूप से कारतूस के भीतर स्थित केवल वह अग्र भाग जो धमाके के बाद बंदूक से बाहर निकलता है, 'गोली' कहलाता है।

बंदूक का ट्रिगर दबाने पर फायरिंग पिन कारतूस के प्राइमर पर चोट करती है, जिससे बारूद में विस्फोट होता है। फैलती हुई गर्म गैसों के अत्यधिक दबाव के कारण गोली तीव्र गति से बैरल से बाहर निकलती है। यह प्रक्रिया न्यूटन के तीसरे गति नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया) का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

संरचना एवं भौतिक विज्ञान

शुरुआती दौर में गोलियाँ पत्थर अथवा ढलवाँ सीसे के गोल छर्रों के रूप में बनाई जाती थीं। आधुनिक गोलियाँ मुख्य रूप से सीसा (Lead), ताँबा, पीतल, स्टील अथवा टंगस्टन जैसी धातुओं से निर्मित की जाती हैं।[1]

बैलिस्टिक गुण एवं वेग

  • सुपरसोनिक गोलियाँ: अधिकांश आधुनिक राइफलों की गोलियाँ ध्वनि की चाल (20 ∘C पर लगभग 343 m/s) से अधिक वेग (सुपरसोनिक) से चलती हैं। इनके आगे वायु में शॉकवेव बनने के कारण एक तीव्र ध्वनि (Sonic Boom) उत्पन्न होती है।[2]
  • सबसोनिक गोलियाँ: इन गोलियों की गति ध्वनि की चाल से कम होती है, जिससे सोनिक बूम उत्पन्न नहीं होता और ये साइलेंसर (Suppressor) के साथ अत्यधिक शांत संचालन प्रदान करती हैं (उदा. .45 ACP)।
  • ऊर्जा स्थानांतरण: गोली में सामान्यतः कोई आंतरिक विस्फोटक नहीं होता; यह अपने उच्च द्रव्यमान और वेग से उत्पन्न गतिज ऊर्जा (Ek=12mv2) को लक्ष्य पर स्थानांतरित करके क्षति पहुँचाती है।

इतिहास एवं विकास

  • 9वीं शताब्दी में चीन में बारूद के आविष्कार के बाद 14वीं शताब्दी में शुरुआती तोपों और हाथ-तोपों (Hand Cannons) में पत्थर और लोहे के गोलों का प्रयोग हुआ।
  • 1820-1840 के दशक में बेलनाकार-शंक्वाकार (Cylindro-conical) गोलियों और 'मिनिए बॉल' (Minié ball) के विकास ने राइफल वाली बंदूकों की सटीकता और मारक क्षमता में क्रांतिकारी सुधार किया।
  • 19वीं सदी के अंत में धुआंरहित बारूद (Smokeless Powder) के आगमन के साथ धातु-लेपित (Jacketed) गोलियों का प्रचलन शुरू हुआ।

प्रमुख प्रकार

  • फुल मेटल जैकेट (FMJ): इसमें सीसे के कोर पर ताँबे या गिल्डिंग धातु का आवरण होता है। यह विकृत हुए बिना उच्च भेदन क्षमता प्रदान करती है और सैन्य मानकों में सर्वाधिक प्रयुक्त होती है।
  • खोखले सिरे वाली गोली (Hollow-Point - HP): लक्ष्य से टकराने पर इसका अग्र भाग छत्र (Mushroom) की तरह फैल जाता है, जिससे गतिज ऊर्जा का त्वरित स्थानांतरण होता है और आंतरिक ऊतकों को अधिकतम क्षति पहुँचती है।
  • कवच-भेदी (Armor-Piercing - AP): इसके भीतर टंगस्टन कार्बाइड अथवा संवर्धित/क्षीण यूरेनियम (Depleted Uranium) का कठोर कोर होता है, जो बख्तरबंद वाहनों और बॉडी आर्मर को भेदने में सक्षम होता है।
  • ट्रेसर गोली (Tracer): इसके पिछले हिस्से में पाइरोटेक्निक मिश्रण (जैसे मैग्नीशियम और स्ट्रोंशियम लवण) भरा होता है, जो जलने पर चमकीला प्रकाश उत्पन्न करता है ताकि शूटर रात में गोली का प्रक्षेप पथ देख सके।
  • गैर-घातक गोलियाँ (Less-Lethal): भीड़ नियंत्रण हेतु प्रयुक्त रबर, प्लास्टिक या बीनबैग गोलियाँ, जो घातक चोट पहुँचाए बिना प्रभाव डालती हैं।
  • ब्लैंक (Blanks): इनमें प्रक्षेप्य (गोली) नहीं होता; केवल ध्वनि और धुआँ उत्पन्न करने के लिए बारूद का उपयोग किया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ एवं नियम

  • सेंट पीटर्सबर्ग घोषणा (1868): 400 ग्राम से कम वजन वाले विस्फोटक अथवा ज्वलनशील प्रक्षेप्यों के युद्ध में प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • हेग कन्वेंशन (1899): सैन्य बलों के विरुद्ध शरीर के भीतर फैलने या चपटी होने वाली गोलियों (जैसे डम-डम गोलियाँ या हॉलो-पॉइंट) के प्रयोग को प्रतिबंधित किया गया।
  • पर्यावरण नियम: सीसे के विषाक्त प्रभाव (Lead Poisoning) से जलचरों और पक्षियों को बचाने के लिए कई देशों में आर्द्रभूमियों और जंगलों में सीसा-रहित (ताँबा, बिस्मथ, स्टील) गोलियों का उपयोग अनिवार्य किया गया है।[3]

संदर्भ

  1. ↑ The National Rifle Association. "A Brief History of Firearms: The Self-Contained Cartridge". NRA Blog.
  2. ↑ Hornady. "Ballistics – Rifle Ammunition Product Lines". Hornady Manufacturing.
  3. ↑ California Department of Fish and Wildlife. "Nonlead Ammunition Regulations".