आदिमुरै (Adimurai)

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आदिमुरै (तमिल: அடிமுறை, Adimurai) एक प्राचीन तमिल युद्ध कला (मार्शल आर्ट) है, जिसकी उत्पत्ति प्राचीन तमिलकम क्षेत्र (वर्तमान तमिलनाडु एवं उत्तरी श्रीलंका) में हुई थी। तमिल भाषा में 'आदि' (Adi) का अर्थ "प्रहार करना या मारना" तथा 'मुरै' (Murai) का अर्थ "पद्धति या विधि" होता है। यह कला मुख्य रूप से कन्याकुमारी, तिरुनेलवेली तथा दक्षिणी तमिलनाडु के क्षेत्रों में विकसित हुई और इसे विश्व की सबसे प्राचीन युद्ध प्रणालियों में से एक माना जाता है।[1]

आदिमुरै का उल्लेख लगभग 400 ईसा पूर्व के प्राचीन संगम साहित्य में भी मिलता है। यह गुप्त एवं घातक युद्ध कला वर्म कलै (Varma Kalai) का व्यावहारिक एवं आक्रामक रूप है, जिसके अंतर्गत विरोधी के शरीर के संवेदनशील मर्म बिंदुओं (Vital Points) पर वार करके उसे तुरंत अक्षम या परास्त किया जाता है।

संरचना एवं घटक

पारंपरिक तमिल ज्ञान में 'वर्म कलै' को पूर्ण करने वाले तीन मुख्य स्तंभ हैं: वासी योग (Vasi Yoga), वर्म वैथियम (Varma Vaithiyam - चिकित्सा पद्धति), और आदिमुरै (Adimurai - युद्ध अनुप्रयोग)।

आदिमुरै को मुख्य रूप से तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है:

  1. आदि तड़ी (Adi Thadi): इसके अंतर्गत निहत्था द्वंद्वयुद्ध (Unarmed Combat) आता है, जिसमें प्रहार (Adi), अवरोध/बचाव (Thadu), और पकड़/ग्रैपलिंग (Pidi) शामिल हैं।
  2. आयुध मुरै (Ayudha Murai): विभिन्न पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों (जैसे लाठी, कटार, तलवार आदि) का उपयोग करके किया जाने वाला सशस्त्र युद्ध।
  3. वर्म आदि (Varma Adi): मानव शरीर के अत्यंत संवेदनशील मर्म स्थलों पर उंगलियों अथवा मुक्कों से सटीक आघात करना।

वर्म आदि के प्रमुख अंग

  • मैयांगल (Maiyangal): शरीर के विशिष्ट मर्म केंद्र।
  • मुद्रांगल (Mudrangal): प्रहार के लिए प्रयुक्त उंगलियों और हाथों की विशेष मुद्राएँ।
  • आडिगल एवं आदिंगल (Adigal & Aadingal): घातक आघात तकनीकें एवं उनके प्रतिघात/पुनरुद्धार विधियाँ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, आदिमुरै का विकास प्राचीन सिद्ध मुनियों द्वारा आत्मरक्षा एवं समाज की सुरक्षा हेतु एक सटीक युद्ध विज्ञान के रूप में किया गया था। यह कला सिलम्बम (लाठी युद्ध) के समकालीन मानी जाती है, जिसके ऐतिहासिक प्रमाण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से मिलते हैं।

चेर, चोल एवं पांड्य राजवंशों के काल में आदिमुरै की तकनीकों को सैन्य प्रशिक्षण में प्रमुखता से शामिल किया गया।[2] दक्षिणी तमिलनाडु के कन्याकुमारी क्षेत्र में नाडार समुदाय और अन्य पारंपरिक योद्धा वर्गों द्वारा इस कला को पीढ़ियों से संरक्षित रखा गया है।

प्रमुख शैलियाँ एवं परंपराएँ

1. अगस्त्य मुरै (Agasthiyar Murai)

महर्षि अगस्त्य की परंपरा पर आधारित यह शैली भारत में सबसे व्यापक रूप से प्रचलित है। इसमें विभिन्न पशु-मुद्राओं और लचीले शारीरिक मूवमेंट्स का समावेश है। दक्षिणी केरल के कलरीपायट्टु (थेक्कन कलरी) के पाठ्यक्रम में इसी शैली के सिद्धांतों को समाहित किया गया है।

2. बोगर मुरै (Bogar Murai)

सिद्ध बोगर की परंपरा पर आधारित यह शैली अत्यंत वैज्ञानिक और संतुलित मानी जाती है।[3] इसमें प्रहार, ब्लॉक और ग्रैपलिंग को समान महत्व दिया जाता है और इसमें योग तथा आंतरिक ऊर्जा नियंत्रण का गहन अभ्यास कराया जाता है।

3. रामलिंग देवर मुरै (Ramalinga Devar Murai)

यह शैली प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियों में वर्णित मूल सिद्धांतों पर आधारित एक अत्यंत गोपनीय एवं पारंपरिक गुरुकुल शैली है।

लोकप्रिय संस्कृति में उल्लेख

  • पटास (Pattas - 2020): आर. एस. दुरई सेंथिलकुमार द्वारा निर्देशित और धनुष अभिनीत तमिल फ़िल्म (तेलुगु में 'लोकल बॉय') की मुख्य कहानी प्राचीन तमिल युद्ध कला 'आदिमुरै' के संरक्षण और इसके आधुनिक किक-बॉक्सिंग के साथ टकराव पर आधारित है।
  • इंडियन / हिंदुस्तानी (1996): एस. शंकर द्वारा निर्देशित और कमल हासन अभिनीत प्रसिद्ध फ़िल्म में नायक द्वारा आदिमुरै और वर्म कलै (मर्म कला) की तकनीकों का उपयोग करते हुए दिखाया गया है।

संदर्भ

  1. ↑ Raj, J. David Manuel (1977). The Origin and the Historical Development of Silambam Fencing: An Ancient Self-Defence Sport of India. College of Health, Physical Education and Recreation, Univ. of Oregon, pp. 44, 50, 83.
  2. ↑ Luijendijk, D.H. (2005). Kalarippayat: India's Ancient Martial Art. Paladin Press. ISBN 978-1-58160-480-1.
  3. ↑ Zarrilli, Phillip B. (2001). "India". In Green, Thomas A. (ed.). Martial Arts of the World: An Encyclopedia. Vol. 1 (A–L). ABC-CLIO, p. 177. ISBN 978-1-57607-150-2.